चला सफ़र मगर रुक गया,
मृदुल नदियां की धार साल के ताबीर सी झरती रहीं,
मैंने पग पसारे दृग की हीरक सी झलकीं,
मेरी अंजुली महकी बूंदें बिखरी गुलशन की लहरों पर चलती रहीं,
मैं भूला थकावट याद बस सफ़र
हर बूंद शिशिर की बसूक सी सफ़र में रिंद सी चलती रहीं,
थकी फटी एड़ियां चंचल बूंदें निहारतीं कुहेरे सी लगती रहीं,
बूंदों की धार वत्सला सी झरती रहीं।
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