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सीता के शील-शक्ति से, नारी के सत का किया सम्मान।

                
                                                         
                            क्रौंच-वध से जागी करुणा, मुख से जो निकला प्रथम छंद,
                                                                 
                            
वही शोक बना श्लोक वहाँ, आदिकाव्य का है जो आनंद।

"रत्नाकर से ब्रह्मर्षि बने, उल्टा जप से पाया ज्ञान,
राम-नाम के तप-बल से, पाया दिव्य अमर वरदान।

"सप्तकाण्ड में गूँथा तुमने, जीवन का नव अर्थ सार,
त्याग, प्रेम, मर्यादा का, जन-जन को दिया अनुपम उपहार।

"रामचरित को लिखकर जिसने, युग को दी नई पहचान,
सीता के शील-शक्ति से, नारी के सत का किया सम्मान।

"लव-कुश को गोद में लेकर, दिया ज्ञान- वेद- विज्ञान,
आश्रम में शिक्षा देकर, किया रघुवंश के यश का गान।

"हे आदिकवि! हे तपोनिधि! हे करुणा के छविधाम,
तेरी लेखनी से पावन, है भारत-भूमि का नाम।"

"जब तक गंग-यमुन जलधार, जब तक रहे ये सूरज-चाँद,
गूँजेगी रामायण हर घर, तेरी युग-युग तक निर्बाध।"
 - सुधा पाण्डेय
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23 घंटे पहले

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