रोज़ के काम रोज़ होते हैं, कुछ रविवार पे टाले जाते हैं,
कहने को तो छुट्टी है लेकिन, बोझ उसी दिन डाले जाते हैं।
शॉपिंग लिस्ट रविवार को खुलती, बाहर जाना रविवार को होता,
परदे-चादर की बारी आती, धोना-सुखाना रविवार को होता।
घर को सेट रविवार को करना, कोने-कोने चमकाने होते,
स्कूल की कॉपियाँ रविवार को, घर में ही चेक कराने होते।
कुछ ख़ास व्यंजन रविवार को, रसोई फिर से महकती है,
बच्चों की सारी खुशियाँ भी, इसी दिन आके दमकती है।
रिश्तेदारों का हाल-चाल भी, रविवार को ही पूछा जाता,
बीते हफ्ते का हिसाब-किताब, इसी दिन पूरा बूझा जाता।
सोचा था आराम करेंगे, पाँव पसारे लेटेंगे हम,
पर रविवार की भाग-दौड़ में, और भी बहुत टूटेंगे हम।
आखिर छुट्टी किसकी है ये? बस एक भ्रम सा लगता है,
रविवार तो सबका आता है, पर उसी दिन ज्यादा परिश्रम लगता है।
- सुधा पाण्डेय
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