तीन घंटे की सुबह, तीन मिनट सी लगती है,
घड़ी की सुई जैसे दस गुनी तेज़ चलती है।
पाँवों की रफ़्तार कछुए से भी धीमी होती है,
और कामों की तो पहाड़ से भी ऊंची गिनती है।
झाड़ू-पोंछा, घर की साफ़-सफ़ाई बाकी है,
किसी का टिफ़िन नाश्ता तो किसी की पढ़ाई बाकी है।
किसी की टाई ढूँढनी, किसी की वर्दी प्रेस करना है,
खुद को भी आईने में थोड़ा सा व्यवस्थित करना है।
बिखरे घर को समेटूँ या खुद को संवारूँ,
समय से लड़ते-लड़ते कैसे खुद को पुकारूँ।
फ़िर भी निकलना है, एक ऐसी मंज़िल के लिए,
जहाँ राह देखती हैं कई आँखें कुछ उम्मीदें लिए।
जहाँ कई माओं की उम्मीदें हजार पलती हैं,
कई पिताओं की मेहनत को पहचान मिलती है।
जहाँ कमज़ोर पंखों को भी आसमान मिलता है,
टूटे हौसलों को भी उनका जहान मिलता है।
ये समय से द्वंद्व भी नारियाँ जीत जाती हैं,
इसीलिए शायद ये गृहलक्ष्मी कहलाती हैं।।
- सुधा पाण्डेय
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