कली बागों में खिलकर सुमन हो गई ,
तूने सिंदूर लगाया मै दुल्हन हो गई, ।
चांद,तारे ,सूरज सब गवाह हो गए,
तेरे नाम की तो मैं सुहागन हो गई,।
लाज, शर्म का घुंघट उठाया तूने,
तेरी नजरें ही मेरा दर्पण हो गई।
छूटा भाई, पिता , मां और बचपन मेरा,
सात जन्मों की तुझसे लगन हो गई।
साथ तुमने निभाया है ऐसे साजन,
रात दुख की अंधेरी पूनम हो गई।
तेरे नाम से मेरी पहचान पिया,
भूली सब कुछ मैं पगली सजन हो गई।
दुख की ज्वाला ने जब भी जलाया मुझे,
तुझसे लिपटी तो फिर से चंदन हो गई।
चुनकर शब्दों को भावो में बांधा पिया,
लिखकर कविता सुधा भी मगन हो गई।
-सुधा पाण्डेय
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