मूक होकर भी आज प्रकृति वाचाल बनी,
मस्त यौवन से मदमाती उसकी चाल बनी,
बलखाती हरियाली ने जैसे और रूप जोड़ा हो,
प्रकृति आज ऐसी सजी मानो युवती नवोढ़ा हो।
कई रंगों से करके श्रृंगार चली,
सभी रत्नों से लदकर ससुराल चली,
मरकत, सोना व चांदी का अंबर ओढ़ा हो,
प्रकृति आज ऐसी सजी मानो युवती नवोढ़ा हो।
नित नए श्रृंगार वो सजाती है,
कभी अंकुर कभी कोंपल कली खिलाती है,
जेठ की धूप के घमंड को मलय पवन ने तोड़ा हो,
प्रकृति आज ऐसी सजी मानो युवती नवोढ़ा हो।
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