हे माधव है धर्म कहां ?
सुनो पार्थ है कर्म जहाँ ।
क्या जीवन की परिभाषा है ?
सुख - दुख, आशा और निराशा है।
कौन अपने और पराए हैं ?
जो भी इस जग में आएं हैं।
जीवन का है क्या लक्ष्य यहाँ ?
देखो काशी में है साक्ष्य वहां।
क्या ये तन ही अपना है?
ये पुतला तो मिट्टी से बना है।
क्या युद्ध ही एक सहारा है ?
हां अधर्म ने तुम्हे ललकारा है।
क्या सरल यहां कोई राह नहीं?
शुरोंं को सरलता की चाह नहीं।
क्या ये गुरूजन बंधु न मेरे है,?
फिर विरुद्ध खड़े क्यों तेरे हैं?
कैसे मै शर सन्धान करूँ?
पांचाली मर्दन का ध्यान धरो ।
उसमें भी कुछ दोष हमारा था,
प्रायश्चित परिणाम तुम्हारा होगा ।
सब कुछ खोकर वो पाना क्या ?
बिन सम्मान के जीवन बिताना होगा।
फिर करूं मैं क्या बतलाओ तो ?
तुम अधर्म पर शस्त्र उठाओ तो ।
ये मन दुविधा में चिन्तित है,
तुम करो पार्थ जो सुनिश्चित है।
हे कृष्ण तुम्हीं कल्याण करो,
जीवन के संशय दूर करो।
अब आया शरण तुम्हारी हूँ,
क्या प्रभु कृपा का अब अधिकारी हूँ?
हे पारथ! भारत है युद्ध धरम का ,
लेखा - जोखा ये है स्व करम का।
संशय दुविधा का परित्याग करो,
न कायरता स्वीकार करो।
रथ सारथी तेरे परमात्मा हैं,
राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं।
है गांडीव तुम्हारे हाथ पड़ा,
है धर्म तुम्हारे साथ खड़ा ।
अजर ,अमर ये आत्मा है,
ये कृष्ण स्वयं ब्रह्मात्मा है।
सब इसमें ही मिल जाएगा,
दुविधा, संशय मिट जाएगा।
मन की मलिनता को शुद्ध करो,
है अब धर्म यही बस युद्ध करो ।
बस युद्ध करो बस युद्ध करो।
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