ये कैसा मैंने दर्द लिख दिया
मैंने मर्द को मैंने मर्द लिख दिया
लेता है सिसकियां जमाने से छुपकर
और जमाने को ही बेदर्द लिख दिया
दर्द का दर्द से रिशता भी अजीब था
जिसने दर्द दिया उसे हमदर्द लिख दिया
बर्फ सी जम् रही थीं सांसें उसकी
यही सोचकर मौसम सर्द लिख दिया
ये कैसा मैंने दर्द लिख दिया
मैंने मर्द को मैंने मर्द लिख दिया
-सुखप्रीत सिंह "सुखी"
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