मैं आज भी ,
ढूँढ़ता हूँ उसे !
तलाश उसकी जारी हैं
रूका नहीं कभी पथ पर
बैठा नहीं कभी थककर
उसके लिये ,
हाँ ! हार मिली हैं अनगिनत
पर हिम्मत न हारी हैं
आज भी
मंजिल की तलाश
जारी हैं ॥
मेरे गंतव्य तक
ले चलना मुझे
मेरे प्रभु !
विचलित न हो जाऊँ
कहीं पथ-भ्रष्ट ,
जानता हूँ बाँह खींचे
बिन तुम्हारे
दल -दल से बाहर
पार कोई ना हो पाया हैं
अनंत गहराईयों को
कौन भला जान पाया हैं
गिरने से पहले आकर श्रुति में
कहना मुझे
चलने को कर्म -पथ पर
प्रशस्त करना मुझे॥
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