शीत लहर से
कंंपकपाता कभी
देखा था उसे ,
सिकुड़ कर एक -एक पत्ते को
गिरते उसे ,
कुछ दिन बाद बीते
नग्न टहनियों के
ढाँचे में
देखा उसे !
सूख गया हो शायद
यह अन्देशा था मुझे
पर जीवित था भीतर से
वह तो जीवंत ,
टहनी पर देखा
उभर आयी नई कोंपलें
गमले में लौट आयी थी वसंत
अचानक ध्यान हो आया
पतझड़ का था प्रचंड ॥
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