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                            पता नहीं क्या हो गया है मुझे...
                                                                 
                            
लग रहा ऐसा, जैसे मिल रही हो किसी गुनाह की सज़ा...
तू है और तेरी किस्मत है... न जाने कब होगा वो दिन...
जब न तू होगा और न ही तेरी किस्मत...
बस होगा वो जो वास्तव में तू है...

नहीं पता क्या व्यक्त करूं, बस शब्दों को पन्ने पर उतार रहा हूँ...
कुछ अर्थ दे रहे हैं... तो कुछ समझ से परे हो रहे हैं...
पता नहीं क्या हो गया है मुझे...
बस जी रहा हूँ और खुद को खुद में खोज रहा हूँ...
बस लिख रहा हूँ... पर पूछो मत क्या लिख रहा हूँ...
हालत है ऐसी कि शब्द भी जवाब दे रहे हैं...
कि "नहीं देंगे हम तेरी दशा को दिशा"...
बस लिख रहा हूँ...
पता नहीं क्या कर रहा हूँ...
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एक वर्ष पहले

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