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यह कविता 'तितली ने खोले कान' पढ़कर आप हो जाएंगे सावधान!

                
                                                         
                            तितली एवं मच्छर
                                                                 
                            

मै एक दिन अपनी गली से जा रहा था
मक्खियों कि भन्नाहट से अपने को बचा रहा था
गली से गुजरने मे असुविधा होती थी
मेरे स्वस्थ बचे रहने में दुविधा होती थी

गली ही नाली बनी थी 
किचडों के चलते सूअरों की आन पड़ी थी
मच्छरों के अंडे नालों में पल रहे थे
नगर पालिका की कृपा से हम हाथ मल रहे थे

बूढ़े मच्छर नये रोग की खोज मे भिड़े थे
जवान संक्रमण हेतु रजनी के इंतज़ार में खड़े थे
मक्खियां दिन – पाली की ड्यूटी बजा रही थी
रोग के कीटाणुओ को खद्यान तक पहुचां रही थीं
वायु की भी लाचारी थी
विषाणुओं के साथ संक्रमण की तैयारी थी

तभी रंग बिरंगी एक चीज़ मुझसे आ टकरा गयी
अपनी भोली सूरत से मेरे मन को भा गयी
वो दु:खी आहत, घबरायी नज़र आती थी
मच्छरों से बड़ी, मुझे देख डर जाती थी
मैंने पूछा तुम कौन? कहां से आयी हो?
यहां कौन तेरा रहता है? किससे मिलने आयी हो?

बोली, मैं तितली, मेरा नाम पुरातनविद है
अपने पूर्वजों के बसेरे, खोजने की ज़िद है
मनुष्य मैंने सुना तुम बड़े बलवान हो
आज तुम दिख रहे क्यों इस कदर परेशान हो
पेड़ पौधों को रौंद तुम अट्टालिका बनाए हो
नदियों की कलकल की जगह नालियो के छ्पाक तक पहुंच आये हो

यही कहीं मेरे बुजुर्गों का बसेरा था
कभी कचड़ों की जगह फूल पौधों का घेरा था
ओवरब्रिज के पास, बूढ़ी नदी का मेंड़ था
इस पेट्रोल पम्प के पास बरगद का भारी पेड़ था
पक्षियों के कलरव का पूरा यहा गूंज था
इस कॉलोनी कि जगह बाग था, एक मूंज का
शेर और बाघ यहां रहा करते थे
हिरण बेचारे उनसे डरा करते थे

बस स्टैंड के पहले यहां, जल का एक कुंड था
था स्नानगृह वह, हाथियो के झुंड का
जगह उचित रही नहीं हम सब के निवास की
कारण तुम ही हो मनुज , इन सभी प्रवास की
इस दशा के हे मनुष्य ! तुम्ही, जिम्मेवार हो
अपनी ही निर्मित वस्तु से हो गये लाचार हो

उड़ते –उड़ते कुछ बोल गई,
मेरे कान वो खोल गई

--------- रे मनुष्य सावधान !

रे मनुष्य सावधान ! डालो न व्यवधान !!
धरा को धारण करने दो हरियाली का परिधान !
प्रदूषण से मुक्त रखो हवा, मिट्टी और पानी !
बची रहेगी तभी तेरे, जीवन की निशानी ! रे मनुष्य सावधान !

पर्यावरण विरोधी गर बने रहे
प्रदूषित गैसो से तने रहे
पेड़ो को गर तुम काटोगे
विकिरण हवा मे बांटोगे
तेरे बच्चे तुझको कोसेंगे
वो रोगी एव विकृत होंगे
ऑक्सिजन सिलिंडर ले दौडेंगे
पेड़ो के बस फोटो होंगे रे मनुष्य सावधान !

बच्चे विद्यालय जायेंगे
शिक्षक उन्हें पढायेंगे
पृथ्वी पर पेड़ भी होते थे
हम शुद्ध हवा मे सोते थे

ऑक्सिजन वृक्ष बनाते थे
कर्बनडाईऑक्ससाइड सोख वे जाते थे
पूछेगा पेड़ वे कहं गये?
हम वृक्ष विहिन क्यों हो गये?
शिक्षक उन्हें समझायेगा
पूर्वजों का कुकृत्य बतलायेगा ! रे मनुष्य सावधान !

रसायनिक पानी पीने को
मजबूर होंगे वो जीने को
नदिया नालियां बन जायेंगी
प्रदूषण स्रोत कहलायेंगी ! रे मनुष्य सावधान !

वर्षा देखने को तरसेंगे
जल स्रोत सभी सूखे होंगे
पृथ्वी मिट्टी विहीन होगी
इमारतों मे विलीन होगी

रे मनुष्य, जल्दी दो कान , सावधान, सावधान... !
9 वर्ष पहले

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