ध्वस्त इमारतें ,उड़ता धुआँ
धरती के गहरे ज़ख्म
हवा चीरते धातु के पंछी
करामातों की जंगी चीत्कार
बम, गोलों की बरसात
सहमे, दुबके
डर के साए में छुपे चेहरे
दरबदर होते बच्चे ;
जुनून की ललकार में
युद्ध कह रहा है
सागर की लहरों में
सोशल मीडिया में
खबरों में, चर्चाओं में
आवश्यकताओं में
बड़ा प्रयोग चल रहा है
न जाने क्यों
जोर शोर से इंसान
दंभ भर रहा है
दिन गर्म हो रहे है
रातें चमक रही है
शक्ति प्रदर्शन में
कहीं कोई कमी नहीं है
मिसाइलों की आवाजें
बड़ी तेज हो रही है
आसमां में चमकती बिजली
धरती पे गिर रही हैं
ज्वाला विकराल हो रही है
हवा में बारूद घुल रहा है
जीवन मिट्टी में मिल रहा है
स्वार्थ के खेल में
दुनियां गज़ब ढो रही है
- शिव
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