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सवाल बोल रहे थे

                
                                                         
                            उतने सवालों का
                                                                 
                            
क्या जवाब लेते
इससे अच्छा था
चुप रह सह लेते

सारे सवालों में
सवाल कम थे
शिकवा और शिकायतें
तमाम तरह के थे

घर का भेद बचाने की
बात कहाँ शेष रही
उनके सवालों में
कहानी कुछ और थी
किसी को बात की
कोई परवाह न थी

अदब और संस्कार
चुपचाप कह रहे थे
उनकी तरह बोलने से
नए सवाल खड़े होंगे
वो खुद को रोक रहे थे

सवालों के चक्कर में
सवाल नए हो रहे थे
घर के सारे पर्दे वो
औरों को सौंप रहे थे

इतने सवालों से
घर अपना तोड़ रहे थे
जगह बिना देखे
अपने ही आँगन में
कांटों का पौधा रोप रहे थे

------- शिव
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2 वर्ष पहले

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