कितनी नासमझ हैं ये औरतें,
जो बंधनों को मर्यादा
गुलामी को सुरक्षा,
और त्याग को प्रेम
कहती हैं - विवाहित हैं हम, नौकरानियाँ नहीं,
फिर ये कैसी रानियाँ हैं,
जिनके नाम ना तो घर है,
ना घर का कोई हिस्सा।
इनके हिस्से में है तो बस,
झूठे बर्तन, मैले कपड़े और रसोई का धुआँ,
फिर भी गर्व से कहती हैं -
हम घर की लक्ष्मी हैं।
सुबह का श्रृंगार भूल जाती हैं,
ढलती शाम फिर सजती हैं,
अपने आराध्य के लिए,
कहती हैं - सुहागन हैं।
ठग ली जाती हैं,
कभी सुहागन होने पर,
कभी लक्ष्मी होने पर।
समाज बताता ही नहीं,
असल में सौदा हुआ है,
बस नाम अलग है...
ये रानियाँ असल में,
कब इंसान बन पाएँगी?
क्या ताउम्र ऐसे ही,
ठगी जाएँगी?
- सृष्टि कुसुम गुप्ता
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