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गिरकर उठना, उठकर चलना, जीवन की पहचान है,

                
                                                         
                            थकान तो मेहमान है, मैं हार नहीं मानूँगा,
                                                                 
                            
मुश्किलों के सामने अपना सिर नहीं झुकाऊँगा।
राह में चाहे कितने भी काँटे बिछे हुए हों,
हौसलों के दीप जलाकर आगे बढ़ता जाऊँगा।

थकान तो आती-जाती, जीवन का एक पड़ाव है,
मेहनत करने वालों के लिए संघर्ष ही नाव है।
मंजिल पाने की खातिर मैं हर संकट सह जाऊँगा,
थकान तो मेहमान है, मैं हार नहीं मानूँगा।

गिरकर उठना, उठकर चलना, जीवन की पहचान है,
धैर्य, साहस और कर्म ही सच्चा स्वाभिमान है।
जब तक साँसें चलती हैं, अपना कर्म निभाऊँगा,
थकान तो मेहमान है, मैं हार नहीं मानूँगा।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

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