शीशा समझकर तुझमें, खुद को निहारता रहा,
तेरे ही अक्स में अपना, अस्तित्व तलाशता रहा।
तेरी सलामती की खातिर, हर पल सावधानी बरती,
जिसमें दिल बसता था मेरा,उसी की किरचें बिखर गये।
टूट जाने से शीशे का, क्या अस्तित्व मिट जाता है?
क्या बिखर जाने से प्रेम का, रिश्ता टूट ही जाता है?
जिसे टूटने से बचाया, वही टुकड़ों में बँट गया,
दिल में जिसका घर था मेरे, वही मुझसे छिटक गया।
फिर भी मेरी मोहब्बत, आज भी वैसी ही है,
तेरे प्रति समर्पण की लौ, आज भी जलती वही है।
जहाँ कभी एक से दिल ने, प्यार का रिश्ता जोड़ा था,
आज उसी के हजार अक्स ने, दिल का दामन घेरा है।
तेरी नजरों में कभी, बस एक ही चेहरा था,
मेरे लिए भी तेरे सिवा, कौन दूसरा अपना था?
आज टूटकर तू हजारों टुकड़ों में बँटकर,
हर टुकड़े में मेरा ही अक्स, निहार रही है।
टूटने से पहले तुझमें, तुझे अकेला देखता था,
तेरे भीतर अपने ही चेहरे का उजाला देखता था।
आज भी मैं तो एक हूँ, मेरा प्रेम भी एक है,
तू हजार टुकड़ों में बिखरी, फिर भी मुझमें अनेक है।
तू बिखरकर भी मेरे दिल में, हजारों रूपों में समाई है,
मैं आज भी वही हूँ, जिसने तुझमें अपनी दुनिया बसाई है।
-सूबा लाल "अंजाना "
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