घर की दीवारों में रहते हैं जो भी,
अनुभव की दुनिया में जीते नहीं हैं।
खुला आसमाँ देखना भी जरूरी,
जो देखा नहीं, कुछ भी सीखा नहीं है।
ज़रा लोगों से मिलकर बातें करोगे,
तो अच्छे-बुरे की पहचान होगी।
किसी के भी चेहरे को पढ़कर तो देखो,
कहीं दर्द होगा, कहीं मुस्कान होगी।
बहुत लोगों के पास हुनर भी बहुत है,
बहुतों के भीतर छुपी दास्ताँ है।
मगर पास बैठोगे, दिल से सुनोगे,
तभी जान पाओगे—कौन क्या है।
किसी को न समझो बिना बात जाने,
न देखो किसी को केवल दिखावे से।
हर एक इंसान के भीतर है दुनिया,
समझ पाओगे उसको करीब आने से।
सीमाओं के अंदर सीमित हैं बातें,
सीमा से बाहर भी दुनिया बड़ी है।
जो घर से निकलकर समाज को समझे,
उसी की समझ में असल जिंदगी है।
न रोको मन की तरंगों को अपने,
न बाँधो विचारों को चारों दिशाओं।
चलो साथ बैठें, मिलें और समझें,
बढ़ाएँ दिलों में नई सद्भावनाओं।
किसी के दुखों को अगर सुन सको तुम,
किसी की खुशी में अगर हँस सको तुम।
किसी की जरूरत में काम आ सको तुम,
तभी तो कहोगे—इंसान हो तुम।
नफरत की बातें बहुत हो चुकी हैं,
अब प्रेम की भाषा सिखानी जरूरी।
जो दूरियाँ बनी हैं दिलों के बीच में,
उन्हें बैठकर साथ मिटानी जरूरी।
न छोटा समझना, न ऊँचा समझना,
हर एक में अपने बराबर को देखो।
किसी के अनुभव से कुछ सीख लो तुम,
किसी को भी अपना समझकर तो देखो।
मिलेंगे तो समझेंगे, समझेंगे तो जुड़ेंगे,
जुड़ेंगे तो दिल से दिल भी मिलेंगे।
घटेगी नफरत, मोहब्बत बढ़ेगी,
सभी साथ चलकर आगे बढ़ेंगे।
घर में रहकर ही दुनिया न समझो,
जरा घर से बाहर भी आना जरूरी।
किसी के पास बैठो, किसी को सुनो तुम,
इंसानियत को जगाना जरूरी।
यही जिंदगी का सही रास्ता होगा,
यही प्रेम का सबसे सुंदर तराना।
चलो एक-दूजे को समझें सभी हम,
यही हो हमारा नया आशियाना।
नफरत घटेगी, मोहब्बत बढ़ेगी,
दिलों में नई एक दुनिया बसेगी।
अगर बनके इंसान रहेंगे सभी हम,
तो धरती को भी स्वर्ग-सी पाएंगे हम।
-सूबा लाल “अंजाना”
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