सावन की बरसात-सी आँखों से पानी झरता है,
धीरे-धीरे वक्त के संग हर घाव कभी भरता है।
संवेदनाओं से ही मन का हर उद्गार निकलता है,
प्रेम के पावन रिश्तों से ही घर-संसार सँवरता है।
आँखों की लाली क्रोध भरा अंगार उगलती है,
माथे की सिकुड़ती रेखा मन की चिंता कहती है।
जिह्वा पर विष-अमृत दोनों का ही वास निराला है,
मीठे बोलों के पीछे भी छिपा स्वार्थ का जाला है।
सच्चे मन की बात सदा व्यवहारों में दिखती है,
झूठे मन की प्रीत स्वार्थ की राहों पर चलती है।
चाटुकारिता करने वालों का अंतर्मन काला रहता है,
सत्य बोलने वाला अक्सर फिर भी अकेला रहता है।
आँखें मन के भाव बतातीं, मुख से शब्द निकलते हैं,
कर्म मनुष्य की पहचान हैं, इनसे भाग्य बदलते हैं।
रूप, रंग और वेश देखकर इंसान न आँका जाए,
मन में जिसके प्रेम बसा हो, उसको गले लगाया जाए।
क्रोध छोड़कर प्रेम बाँटिए, कटुता दूर भगाइए,
सत्य, दया और नेक विचारों से जीवन महकाइए।
वाणी में अमृत घोलिए, व्यवहार सरल रखिए,
इंसानियत की राह पकड़कर जीवन सफल बनाइए।
-सूबा लाल "अंजाना "
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