नीचे धरती, ऊपर नभ है,
बीच वायु में जीवन सब है।
धरती पर अधिकार सभी का,
वायु में ही जीवन ये निहित है।
खुशबू कभी बँटी नहीं है,
जल बिन कोई जिंदगी नहीं है।
नदी, पहाड़ और वृक्ष सभी के,
ऋतुओं के उपहार सभी के।
माता-पिता और संतान सभी के,
रक्त का एक संचार सभी में।
दुख-सुख सबके, साँस सभी की,
जीवन का अधिकार सभी में।
प्रेम का धागा सबको जोड़ता,
भेदभाव की दीवारें तोड़ता।
प्रकृति न करती भेद किसी से,
सम व्यवहार करे वह सभी से।
धरती माँ की गोद सभी की,
नभ की छाया भी सबकी है।
मिल-जुलकर इसकी रक्षा करना,
जिम्मेदारी अब सबकी है।
जाति-धर्म का भेद भुलाकर,
मानवता को आगे लाकर,
एक धरा पर जन्मे हम सब,
एक-दूसरे के लिए बनें हम।
-सूबा लाल "अंजाना"
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