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घर और चारपाई

                
                                                         
                            एक चारपाई, जिस पर कई सपने देखे,
                                                                 
                            
कुछ पूरे हुए होंगे, कुछ अधूरे रह गए होंगे।
वो घर, वो जगह, वो चारपाई आज भी है,
मेरे बाद भी रहेगी, कितने मौसम बीत गए होंगे।

कितनों ने इसी घर में ख्वाब सजाए होंगे,
कुछ ने जीते-जी उन्हें सच कर दिखाए होंगे।
कुछ सपने अपने साथ ही लेकर चले गए,
कुछ अपनों की आँखों में छोड़ आए होंगे।

किसी ने इसी आँगन में बचपन बिताया होगा,
किसी ने यहीं जवानी का गीत गाया होगा।
किसी ने इसी चौखट पर रिश्ते जोड़े होंगे,
किसी ने यहीं अपनों को दूर जाते देखा होगा।

बड़ी शिद्दत से मकाँ को उन्होंने घर बनाया होगा,
ईंट-पत्थरों में रिश्तों का संसार सजाया होगा।
कइयों से बिछुड़े, कइयों को जीवन में पाया होगा,
हर रिश्ते ने कोई न कोई रंग चढ़ाया होगा।

न धन साथ जाएगा, न मकाँ साथ जाएगा,
न ये कमरा, न आँगन, न सामान साथ जाएगा।
बस रह जाएँगी यहां पर कुछ धुंधली यादें,
और चारपाई पर पड़ा एक खालीपन रह जाएगा।

कल कोई और यहाँ अपने सपने सजाएगा,
इस चारपाई पर बैठकर जीवन को समझाएगा।
वो भी कुछ पाएगा, कुछ खोता चला जाएगा,
और एक दिन मेरी तरह दुनिया को छोड़ जाएगा।

चारपाई वही होगी, वही घर, वही जगह,
बदलते रहेंगे बस चेहरे और उनकी वजह।
ज़िंदगी आती-जाती रहेगी इसी तरह,
घर रह जाएगा—इंसान चला जाएगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 hours ago

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