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इंसानियत ही कर्म है, इंसान बनकर रहना,

                
                                                         
                            भीड़ मत मचाना, कतार में चले आना,
                                                                 
                            
तुमको भी है जल्दी, हमको भी है जाना।
सबको पड़ी जल्दी, सब व्यस्त हैं यहाँ,
इंसानियत के नाते अनुशासन अपनाना।

सब काम छोड़कर यहाँ आते हैं लोग,
मन में छिपाए कितने दुख और संजोग।
मजबूरियाँ हैं सबकी, सबकी अपनी कहानी,
किसी की आँखों में आँसू, किसी की परेशानी।

कोई उम्रदराज है, कोई जवान है,
हर चेहरे के पीछे छिपी एक दास्तान है।
उम्र का लिहाज करके, थोड़ा ध्यान देना,
ज़रूरतमंद को आगे बढ़ने का मान देना।

कोई उम्र से लाचार है, कोई बीमार है,
किसी के लिए इंतजार भी बड़ा दुश्वार है।
उसकी विवशता को भी समझना ज़रा,
दया और सहयोग का हाथ बढ़ाना ज़रा।

धक्का न देना किसी को, न ऊँची आवाज़ करना,
अपनी बारी आने तक धैर्य से इंतजार करना।
नियमों का पालन ही सभ्य समाज की पहचान है,
दूसरों का सम्मान करना इंसानियत की शान है।

इंसानियत ही कर्म है, इंसान बनकर रहना,
अपने

च्छे संस्कारों को सदा जीवित रखना।
आज किसी को सहारा, कल तुम्हें भी सहारा होगा,
समय का पहिया घूमेगा, तुम्हारा भी बुढ़ापा होगा।

आज जो वृद्ध खड़े हैं, कल तुम भी हो जाओगे,
आज जो दर्द समझोगे, कल सम्मान पाओगे।
इसलिए प्रेम बाँटना, किसी का दिल न दुखाना,
कतार में चलना सीखो, इंसानियत निभाना।
-सूबा लाल 'अंजाना'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 hours ago

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