अँधेरी रात में सब कुछ काली नज़र आती है,
ज्ञानी की बुद्धि भी यहाँ मात खा जाती है।
नेत्रहीन जिसने रंगों को कभी देखा ही नहीं,
उसे शब्दों से रंगों का ज्ञान कराया नहीं जा सकता?
जिसकी आँखों ने संसार का रूप नहीं पाया,
क्या बुद्धि ने उसके अनुभव को समझ पाया?
जो स्वयं न देख सके, उसे कोई क्या दिखलाएगा,
अनुभव के बिन ज्ञान अधूरा ही रह जाएगा।
जिस सत्य को अनुभव की आँखें पहचान पाती हैं,
वहाँ बुद्धि की सीमाएँ भी ठहर जाती हैं।
जो स्वयं ने न जिया हो, वह पीड़ा क्या समझेगा,
बिन अनुभूति के ज्ञान अधूरा ही रहे जायेगा।
-सूबा लाल ' अंजाना '
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