नदिया के उस पार गाँव अब भी मेरा दिल रहता है,
बार-बार उस गाँव में जाने को मेरा मन कहता है।
सपनों में वह दृश्य आज भी चुपके-चुपके आता है,
गली-गली का हर इक कोना मस्तिष्क-पटल पर छाता है।
जहाँ कभी न भीड़-भाड़ थी, अब जनसागर लहराता है,
छोटी-छोटी राहों पर भी जीवन गीत सुनाता है।
हर चौक और चौराहे पर जैसे उत्सव का आलम रहता है,
अपनापन भी हर चेहरे से झर-झर होकर बहता है।
भारद्वाज की कुटी जहाँ थी, जहाँ राम का मिलन हुआ,
ऋषियों की उस पुण्य धरा पर धर्म का नव सृजन हुआ।
वनगमन के पथ पर प्रभु ने जहाँ विश्राम लगाया था,
ऋषि के ज्ञान-सुधा से अपने जीवन को महकाया था।
गंगा, यमुना, सरस्वती का पावन संगम बहता है,
जिसके निर्मल जल में डूबा हर मन उज्ज्वल रहता है।
सदियों से श्रद्धालु जन का विश्वास यहाँ पर पलता है,
पाप-ताप सब हर लेता जो संगम में जाकर मिलता है।
जिसे इलाहाबाद थे कहते, अब प्रयागराज कहलाता है,
तीर्थराज की महिमा से यह जग में शीश उठाता है।
बारह वर्षों में कुंभ यहाँ पर भव्य रूप धर आता है,
संतों, साधु-महात्माओं से पूरा धाम सज जाता है।
अक्षयवट की छाँव निराली, किले का गौरव गाता है,
हनुमान जी का लेटा मंदिर भक्तों को लुभाता है।
इतिहास, धर्म और संस्कृति का अद्भुत संगम रहता है,
नदिया के उस पार बसा वह नगर हृदय में बसता है।
नदिया के उस पार गाँव अब भी मेरा दिल रहता है,
बार-बार उस पुण्य धरा पर जाने को मन कहता है।
जन्मभूमि की स्मृतियों का दीप सदा ही जलता है,
दूर रहूँ चाहे जितना भी, मन वहीं विचरता रहता है।
-सूबा लाल "अंजाना"
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