उत्सव हैं सबके लिए आते, वो नहीं आ पाता हैं।
माँ भारती रहे सलामत, बेटे का फर्ज निभाता है।।
ऊंच- नीच का भेद छोड़, एकता का पाठ पढ़ाता है।
अपनों की जान बचाने खातिर, अपनी जान गंवाता हैं।।
हो खुशियों भरी होली हमारी, लहू से भी रंग जाता हैं।
जश्न दिवाली मना सके हम, दुश्मन से लड़ जाता हैं।।
हर एक बहन के भाई की, रक्षा का प्रण निभाता है।
उठा बंदूक हाथ में जैसे, रक्षासूत्र बंधवाता है।।
परिवार बसाकर दिल में ही, घूंट आंसुओं के पीता है।
नन्हे चेहरों को बड़ा होते, वह देख तस्वीर में पाता है।।
एक बरस में तीन माह बस, वह घर को आ पाता है।
संकट हो जब भारत मां पर , वह तीन माह भूल जाता है।।
- सीता गुर्जर
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