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तुममें...

                
                                                         
                            किस बात की रार है तुममें
                                                                 
                            
कोई विरोधी अखबार है तुममें
मैं जो कहता हूँ.. तुम उसके उलट सुनते हो
शायद विपरीत सरकार है तुममें

- सिद्धार्थ गोरखपुरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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