स्वतंत्रता दिवस सुनते ही,
हमें ये ख्याल आता है,
अंग्रेजों को मार भगाया,
भारत को स्वतंत्र बनाया है।
भारत माता की जय, भारत माता की जय,
यह नारा हम सभी लगाते हैं,
किंतु इनके अंदर छिपे,
कुपुत्र को न देख पाते हैं।
नारी–अपमान, नारी–अत्याचार,
हर रोज बढ़ता जाता है,
लेकिन हमको इससे क्या,
हमको तो राजनैतिक स्वतंत्रता दिवस मनाना है।
चौखट पर खड़ी स्वतंत्रता की,
आंखों में दर्द, हृदय में सवाल कई,
क्या यही है स्वतंत्र भारत की पहचान,
जिसके लिए दिये थे हमारे पूर्वज बलिदान ?
लहराता विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
फिर भी आंखों में उसके उदासी है,
समाज के इस अंधकारों से उसका मान डगमगाता है,
और पूछता सवाल हम सब से,
क्या ये स्वतंत्रत भारत है ?
पूछती है महाभारत की द्रौपदी आज,
कहाँ गए वे धर्मराज,
रामायण की सीता पूछे सवाल,
क्यों है आज भी नारी पर अत्याचार,
कहाँ गए वो हनुमान,
जिन्होने लंका जलायी थी,
कहाँ है प्रभु श्रीराम,
जिन्होने रावण मार गिराया था ?
पूछे लक्ष्मीबाई की तलवार,
जिसने लड़ा था वीरता का युद्ध,
क्यों बेटियां आज है असहाय,
क्यों सहती है ऐसा क्रूर हृदय विदारक युद्ध ?
कहाँ गए वो संविधान के पन्ने,
जो जीवन और सम्मान की बात करते हैं,
कहाँ गए वो न्यायालय,
जो न्याय दिया करते हैं,
कहाँ है वो लोग जो कहते हैं,
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,
क्या वो कर पायेंगे हर बेटी के अरमानों का न्याय ?
पूछते हैं हमारे शहीद आज,
है क्या ये वही भारत,
जिसके लिए हमने दिया था बलिदान,
क्यों वो आज रात के अंधेरे में कांपती है,
क्यों दिन के उजालों में भी,
आंखों में डर रहता है ?
क्या है ये वही धरा,
पूछती हैं आज भारत माँ,
जहाँ बेटियों को लक्ष्मी माना जाता है,
जहाँ माँ दुर्गा–काली,
अत्याचार का विनाश किया करती थी ?
समय आया है ऐसा आज,
बेटियों को दुर्गा–काली बनना होगा,
उठाना होगा लक्ष्मीबाई की तलवार,
और अपने स्वाभिमान के लिए लड़ना होगा।
लड़ना होगा शहीदों के बलिदान के खातिर,
अपना सम्मान पुनः लेना होगा,
जागना होगा समाज को आज,
स्वतंत्रता का सही अर्थ समझना होगा।
चलो करे एक नए भारत का निर्माण,
जहाँ न हो नारी पर अत्याचार,
मिले हर बेटी को सम्मान,
और हो वो आत्मनिर्भर,
चल सके रात के अंधेरे में भी निडर।
तब होगा हमारा भारत महान,
हमारा भारत स्वतंत्र,
और गर्व से मना पायेंगे यह स्वतंत्रता दिवस।
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