जब - जब देखू में रात चांदनी की,
लगता मुझे पृथक्करण,
मानो जल उठे चतुर्दिग
आसमान में चाँद की आभा
देख लगता कि ये बात रात कि ,
पवेतों पर निशीथ के समय
जब आवाज नाद वृक कि
काँप उठें अर्ध रात को
देख उसके रूप को
जब लगे उसके भयानक नख और रोम
ऐसा लगत मानो खूँखार व्याघ्र
अगर आ जाए वह सामने
निकल जात अच्छे - अच्छे की चीत्कार
माता बोली सो जाओ
गहरी निद्रा में नही तो
यह व्याघ्र जैसा दिखत
ले जावे आपने संग
तत्पक्षात् जब - जब देखू में
रात चांदनी की लगता मुझे पृथक्करण
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X