बंधनो में जकड़ा मनुष्य ,
जिसकी भावनाएं संवेदनाएं मर चुकी हैं।
कब हो पायेगा मुक्त ,
जिसकी उम्मीद दम तोड़ रही है।
प्रेम का वास्तविक अर्थ जो भूल चूका है ,
बंधनों के मकड़जाल में जो फंस चुका है
उन्मुक्त आसमान जिसे नज़र नहीं आता
भाव - सीमित , आंखे - धुंधली जो देख नहीं पाता।
बंधन - मुक्त या जीवन - मुक्त समझ नहीं पाता ,
क्या है जीवन , जी नहीं पाता।
घुटी सांसे , झुका सर उठा नहीं पाता ,
हूँ आज , कल का पता नहीं पाता।।।।।
!!! शुभेंदु मिश्रा ' निशीथ '
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