मेरी एक क़िताब तेरे नाम हो जाए
जिसे पढ़ते सुबह से शाम हो जाए
तेरी हर अदा पर एक ग़ज़ल लिखूं
जो उसको पढ़े तेरा गुलाम हो जाए
लिखूंगा तेरी आंखों में चांद सा नूर
हर्फ को देखते ही आराम हो जाए
मैं दश्त-ए-तसव्वुर में लिख रहा हूं
तू यहां आए तो मेरा काम हो जाए
इसी तरह तेरे बारे में लिखता रहूं
तो एक न एक दिन मेरा नाम हो जाए
—शुभम वैष्णव
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