आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आस्मां रौशन और रौशन धरती, जले जगमग दीप दिवाली के..

                
                                                         
                            हर घर को रौशन करती,
                                                                 
                            
जले जगमग दीप दिवाली के
आस्मां रौशन और रौशन धरती,
जले "जगमग" दीप दिवाली के
"फड़फड़-फड़फड़" लड़ीयां फुटे
"छरछर-छरछर" फुलझड़ीयां छुटे
"सतरंगी छटा" झिलमिल बिखरे
जैसे "आसमान" से तारे टूटे
हर घर जलती "मिट्टी का दीया"
हर घर बंटते "खील-बताशे"
आओ मिलकर झूमे नाचे
बज रहे मृदंग और "ढोल-ताशे"
घर आंगन सब चमके-दमके,
हर चेहरे पर रौनक खुशहाली के
कटी बरसात, फिर कटे फसल
और कटे दिन बदहाली के
हर घर को रौशन करती,
जले जगमग दीप दिवाली के
आस्मां रौशन और रौशन धरती,
जले जगमग दीप दिवाली के..
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर