दिल में इक शोला-सा भड़कता जा रहा है अभी,
हर सू धुआँ-धुआँ-सा उठता जा रहा है अभी।
जो मेरी ज़िन्दगी में था कभी आफ़ताब-सा,
बिन शाम हुए ही वो ढलता जा रहा है अभी।
डूबती नहीं हूँ मैं दरिया-ए-माज़ी में फिर भी,
क्यों हर्फ़-ए-नश्तर सा चुभता जा रहा है अभी?
झटक दिया है मैंने उस दर्द-ए-हिज़्र को कब का,
फिर भी ये ज़ख़्म मेरा बढ़ता जा रहा है अभी।
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