जब हम दूर-दूर थे,
तो कितने पास-पास थे,
होकर पास-पास हम,
फिर दूर-दूर हो गए।
अब यह दिल भी करता नहीं
शोर धड़क-धड़क,
न ही आती है प्यार की
कोई महक-वहक।
सूख गई आँखों की नदियाँ,
भीगते नहीं अब कोर,
न वह चितवन रही,
न रहा चाँद-चकोर।
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