गर इश्क़ इबादत है तो इस पर झगड़ा क्यूंँ है ?
सच्चे प्रेमियों के मिलने पर इतना पहरा क्यूंँ है ?
जाति-धर्म के वास्ते अलगाववादी नीति ठीक नहीं
निहित हो सम्मान समर्पण तो ये विवादित माजरा क्यूँ है ?
झूठी इज्ज़त ख़ातिर अंश सौंप देते हैं अनजानों को
ज़ुल्मतों से मिटते अस्तित्व देख होता उदास चेहरा क्यूंँ है ?
हमने जब ख़ुद हीं मार ली कुल्हाड़ी अपने पैरों पर
तो फिर किसी के आगे रोना अपना दुखड़ा क्यूंँ है?
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