कभी मोहनी राधा की, तो कभी यशोदा पुकारे
कभी बैठकर गोपियों को, वो छेड़ता यमुना किनारे
माखन चुराता सखा संग, कभी सखियों को सताये
कभी कान्हा की बंसी, मोहकर मेरे मन को चुराये
कभी स्वर से अपने, मधुरिम से गीत सुनाये
कभी गैया को खिलाये, कभी कंस का वध कराये
कभी युद्धभूमि में वो, कृष्ण बनके पांडव जिताये
द्रोपदी की आँखों के तारे, सभा में उनकी लाज बचाये
कदंब का पेड़ जो कभी, रहा था यमुना किनारे
छोड़कर सब पतझड़ वहाँ, सावन के कृष्ण को पुकारे
चूमती अधरों को कभी, कभी छोड़ती मीठी आहें
कान्हा की बंसी बजती जहाँ, मोह लेती सबकी निगाहें !
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