आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम अकारण आए मेरे जीवन में,

                
                                                         
                            स्मृति तुम्हारी,
                                                                 
                            
बरबस स्नायुतंत्र को छेड़ जाती है
तुम्हारी ख़ामोशी हृदयतल तक
सन्नाटा जड़ जाती है,
तुम कौन हो ?
-
तुम्हारे दो शब्द
दिनों तक
मन में गूँजते रहते हैं
तुम साँस कहीं लेती हो,
सनसन हमें सुनाई देती है
तुम हँसती वहाँ हो
मुस्कान हमें आती है,
तुम सिसकती उधर हो,
दर्द इधर होता है
तुम उदास होती हो,
खिन्नता हमें होती है
तुम प्रसन्न होती हो,
गुदगुदी हमें होती है
तुम कौन हो ?
-
तुम शायद कोई नाम नहीं,
एक अनकहा एहसास हो,
मेरी ख़ामोशी में बजती धुन,
मेरी धड़कनों के पास हो,
न तुम मेरी, न मैं तुम्हारा,
किन्तु संबंध परिपूर्ण है,
और प्रश्न यथावत कि
तुम कौन हो ?
-
मैं स्वयं नहीं चाहता,
परिभाषित हो
यह संबध तुम्हारा मेरा,
यथावत् बना रहे
न आगे बढ़े न पीछे मुड़े
अपूर्ण रहो तुम
अधूरे रहें हम
तुम अकारण आए मेरे जीवन में,
अबूझ ही बने रहो,
हमारे जीवन काल में भी,
जीवन के उपरांत भी,
प्रश्न जीवित रहे,
तुम कौन हो ?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर