ग़ज़ल
हिन्दू - मुस्लिम भाईचारा प्यार मिटाकर बैठे हैं,
गुलशन में कुछ गंदे दिल के आग लगाकर बैठे हैं।
चीख रही है प्यारी धरती मांग रही है आजादी,
लेकिन गूंगे - बहरे संसद में कान दबाकर बैठे हैं।
उनका ही अधिकार रहे सोने की इस चिड़िया पर,
जगह -जगह पर आज शिकारी जाल बिछाकर बैठे हैं।
छाई हुई है आज मुफ़लिसी लाचारी जो हर ज़ानिब,
निर्धन का हक ये धन वाले ही तो दबाकर बैठे हैं।
सज़ा कड़ी हो ऐसे ज़ालिम हर पाखंडी शैतानों पर,
बहन - बेटियों पर जो गंदी नज़र लगाकर बैठे हैं।
गली - गली चौराहों पर हैं कुछ ऐसे ठेकेदार बसे,
मज़हब और धरम की जो दुकान लगाकर बैठे हैं।
~शिवसागर"सहर"
जिला- करमहा(सोनाडीह)
महराजगंज (उत्तरप्रदेश)
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