बीत गये आज़ादी के अस्सी बरस,
संजोए सभी ने कि सुख हो सरस।
राजतंत्र को भेद लोकतंत्र जो पाया,
संघर्षों में हर कोई देश के काम आया।।
गुलामी की जंजीरों में जकड़ता गया,
पर भारत के वीरों का सीना न डिगा।
गजनी, ऐबक, बाबर और क्लाइव आया,
मगर नक्शा इस भूमि का मिटा न पाया।।
नई संस्कृति और नया धर्म जो जमाया,
सनातन धारा को वह हिला न पाया।
रक्त नदियों सा यहाँ कल-कल बहता रहा,
जौहर हुए, पर दुश्मन सिंदूर न मिटा पाया।।
हुईं क्रांतियाँ और आंदोलन थे अनेक,
पर आपस में कभी हम हुए न एक।
इसी भेद का तुगलक, मुग़ल, अंग्रेज़ ने लाभ उठाया,
जिसे भारतवर्ष समझ देर से पाया।।
देखते रहे लोग स्वप्न सदा अविनाशी,
स्वराज की तमन्ना रही अंतर की प्यासी।
वर्ष सैंतालीस में हुआ स्वप्न साकार,
भारतवर्ष ने पाया एक नया आकार।।
वीरों का बलिदान आख़िर काम आया,
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र पाया।
लगा अब कि जीवन होगा पूर्ण खुशहाल,
पर क्या कहूँ मैं आज के अस्सी साल के हाल!
गैर-जिम्मेदार हुआ आज का युवा हमारा,
फिर भी प्राणों से प्रिय है वतन हमारा।
स्वच्छ-भारत, स्वस्थ-भारत की आस अधूरी,
प्रदूषण की भेंट चढ़ी श्वासों की डोरी।।
हे देशवासियों! अब तो उठाओ जिम्मेदारी,
वो राष्ट्रप्रेम जो जागता केवल पंद्रह अगस्त पर,
स्थायी बनकर वह क्यों नहीं ठहरता हर ज़र्रे पर?
बीत गये आज़ादी के अस्सी बरस,
जागो, तभी जीवन होगा सचमुच सरस!
- शिव लाल गुर्जर भीलवाड़ा
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