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पता नहीं क्या भरोसा है, जो जाता नहीं अंदर से,

                
                                                         
                            काश दिखा पाता दिल की वो कशिश,
                                                                 
                            
काश देख पाता दिल की तेरे कशिश।

काश कभी राहें एक होतीं,
काश तू दिखा पाती सारे पाले हुए ख़्वाब,
काश मैं जी पाता सारे तेरे ख़्वाब।

काश मुकम्मल कर पाते उन ख़्वाबों को,
मिलकर जो देखे हैं तूने मेरे लिए, मैंने तेरे लिए।

काश ख़ुदा इतना बेरहम न हो,
काश ये ख़्वाब अँधेरों में दफ़्न न हो।

शायद इतना आसान नहीं है प्यार हमारा,
ऐसे कैसे ख़त्म होगा संसार हमारा?

उतरेगी बुलंदी क़दमों में, ज़रूर,
मन अड़ा बैठा है, होके मजबूर।

पता नहीं क्या भरोसा है, जो जाता नहीं अंदर से,
सब नज़र आ रहा है ख़िलाफ़ बाहर से।

फिर भी वो चेहरा आईने में नज़र आता है,
“तुम कर लोगे,” विश्वास मन में लाता है।

आँखें मिलाकर कहता है,
“ऐसे कैसे हार बैठे?
उठो, चलो , आगे बढ़ो,
अभी बहुत दूर चलना है।

तारे बैठे हैं इंतज़ार में,
उनसे आगे निकलना है।”
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18 घंटे पहले

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