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सुलझे हुए हैं लोग

                
                                                         
                            बाहर से तो लगते हैं ये सुलझे हुए हैं लोग
                                                                 
                            
अंदर तो अपने आप से उलझे हुए हैं लोग

उनका इरादा ज़माने को पूरी तरह बदलना
लेकिन पुरानी लीक पर अटके हुए हैं लोग

सबकी युगों से ख्वाहिश तो है अमर होने की
अमरत की तलाश में सब भटके हुए हैं लोग

कहने को नहीं कुछ भी अब और कुछ ज्यादा
एक मुहब्बत के सवाल पे अटके हुए हैं लोग

दोस्तों की बात का बुरा मानना क्या है दास
महफ़िल में आ गए ये कुछ बहके हुए हैं लोग. .
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

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