जैसे मेरी बच्ची मेरे पैरों से लिपट जाती है
गांव की कुछ धूल मेरे शहर चली आती है
सुबह का स्वागत करने को मुँह अँधेरे ही
रोज इक चिड़िया अभिवादन में गाती है
चाँदनी रात में बिखरी कोई ओस की बूंद
जंगल में नायाब मोती सी नजर आती है
रात भर बैचेन रहे हैं वो किसी की फ़िक्र में
उनके उतरे चेहरे की रंगत यें खुद बताती है
हार या जीत बराबर हैं मोहब्बत में दोनों
दुनियां की हरेक कहानी यही दोहराती है
ना अब मैं वो हूँ और ना ही तुम वो हो दास
रंग रूप शान वक्त के साथ बदल जाती है! !
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