कोई ईमान बेच देता है, कोई अपना ज़मीर बेच देता है,
मौका मिले जो दौलत का, इंसान अपना रक़ीब बेच देता है!!
कोई धर्म के नाम पर, तो कोई जाति पर सियासत करता है,
कुर्सी की भूख में नेता, जनता की तक़दीर बेच देता है!
कोई कलम को गिरवी रखकर, हुक्मरानों के गीत लिखता है,
जो सच की आवाज़ उठाए, उसे ही बदनाम कर देता है!!
कोई खाकी पहनकर कानून का रखवाला बन जाता है,
भाव अच्छा लग जाए तो , इंसाफ़ का तराज़ू आसानी से बेच देता है!!
कोई मंदिर-मस्जिद बाँटकर, नफ़रत का व्यापार करता है,
और फिर उसी नफ़रत पर वोटों का कारोबार करता है!!
गरीब की झोपड़ी बिकती है, अमीरों के महल सजते हैं,
यहाँ भूखे पेट सवाल करें, तो उनके होंठ सिल दिए जाते हैं!!
कोई अदालत में सच को तारीख़ों में उलझा देता है,
कोई गवाह खरीदकर मुजरिम को मसीहा बना देता है!!
कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देता है..
*मिले अगर भाव अच्छा, जज भी कुर्सी बेच देता है!!*
तवायफ फिर भी अच्छी, के वो सीमित है कोठे तक..
*पुलिस वाला👮 तो चौराहे पर वर्दी बेच देता है!!*
वाह रे दुनिया! तेरा भी क्या गज़ब का बाज़ार है,
यहाँ इंसान की कोई कीमत नहीं, बस दौलत का बाजार लगता है!!
- शिवम यादव
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