आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेच देता है

                
                                                         
                            कोई ईमान बेच देता है, कोई अपना ज़मीर बेच देता है,
                                                                 
                            
मौका मिले जो दौलत का, इंसान अपना रक़ीब बेच देता है!!

कोई धर्म के नाम पर, तो कोई जाति पर सियासत करता है,
कुर्सी की भूख में नेता, जनता की तक़दीर बेच देता है!

कोई कलम को गिरवी रखकर, हुक्मरानों के गीत लिखता है,
जो सच की आवाज़ उठाए, उसे ही बदनाम कर देता है!!

कोई खाकी पहनकर कानून का रखवाला बन जाता है,
भाव अच्छा लग जाए तो , इंसाफ़ का तराज़ू आसानी से बेच देता है!!

कोई मंदिर-मस्जिद बाँटकर, नफ़रत का व्यापार करता है,
और फिर उसी नफ़रत पर वोटों का कारोबार करता है!!

गरीब की झोपड़ी बिकती है, अमीरों के महल सजते हैं,
यहाँ भूखे पेट सवाल करें, तो उनके होंठ सिल दिए जाते हैं!!

कोई अदालत में सच को तारीख़ों में उलझा देता है,
कोई गवाह खरीदकर मुजरिम को मसीहा बना देता है!!

कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देता है..
*मिले अगर भाव अच्छा, जज भी कुर्सी बेच देता है!!*

तवायफ फिर भी अच्छी, के वो सीमित है कोठे तक..
*पुलिस वाला👮 तो चौराहे पर वर्दी बेच देता है!!*

वाह रे दुनिया! तेरा भी क्या गज़ब का बाज़ार है,
यहाँ इंसान की कोई कीमत नहीं, बस दौलत का बाजार लगता है!! 
- शिवम यादव 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर