माँ होती है करूणा की सागर
करती है संतान को दुलार
जब आती है विपदा शिशु पर
ला देती है प्रलय जग पर
जब आती है निंदिया शिशु को
सुनाती है लोरियां शिशु को
सुलाती है अंचल में शिशु को
लुटाती है ममता अपनी शिशु को
माँ होती है करूणा की प्रतिमा
जब होता है शिशु भूखा
खिलाती है हाथों से, मक्खन शिशु को
पिलाती है हाथों से, दूध शिशु को
जब चलता है शिशु अकेला
बनती है माँ उसका सहारा
जब रोता है शिशु, देखकर खिलौना
दिलाती है माँ, शिशु को खिलौना
जब रूठता है शिशु तोडकर खिलौना
मनाती है माँ, दिलाकर नया खिलौना
होता है शिशु खुश
पाकर नया खिलौना
होती है माँ खुश
दिलाकर नया खिलौना
माँ होती है ममता की मूरत
जब होता है शिशु चोट से आघात
लगाती है माँ मरहम शिशु को
होती है दुखी देखकर आघात शिशु को
सुलाती है अंचल में शिशु को
लुटाती है ममता अपनी, शिशु को
जब करता है नटखटपन शिशु, माँ के संग
बन जाती है माँ नटखट, शिशु के संग
-शिवम विश्वकर्मा
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