गूँजती रही लहरों में वो ममता की पुकार आखिरी,
साँसों ने तोड़ दी डोर पर टूटी न थी वो धार आखिरी।
लड़ गई मौत से भी माँ अपने लाल को बचाने की खातिर,
बाँहों में सिमटी रही बस वो ममता की दीवार आखिरी।
लहरें डराने लगीं, पर माँ का कलेजा न डोला,
सीने से चिपटा रहा उसका वो नन्हा सा गोला।
जब रूह निकल गई, तब भी बाँहें न छूटीं,
मौत की गोद में भी माँ ने प्यार का जादू है घोला।
लहरों की बेदर्दी में भी, ममता का दिया जलता रहा,
काल के उस क्रूर साये में, माँ का कलेजा पलता रहा।
साँसें तो थम गईं पर, सीने की वो गरमाहट न गई,
मौत के आगोश में भी, माँ का आँचल ढलता रहा।
नसीबों की स्याही से, वो आख़िरी पैगाम लिख गई,
अपने जिगर के टुकड़े के नाम, अपनी हर शाम लिख गई।
मिट गई हस्ती मगर, वो रिश्ता अमर कर गई दुनिया में,
मौत की उस किताब पर, माँ अपना नाम लिख गई।
-शीतल राज 'किशोर'
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