“जब छठ उतरता है बिहार में”
जब छठ उतरता है बिहार में,
माटी बोल उठती है,
सूनी पड़ी किसी चौखट पर
आहट डोल उठती है।
बाँसों में फिर साँसें आतीं,
सूप सुनाता कथा,
दउरे में फल कम होते हैं,
अधिक होती है व्यथा।
जब छठ उतरता है बिहार में,
घर फिर घर हो जाता है,
दूर गया जो वर्षों पहले,
वह भी अपना हो जाता है।
नदी किनारे शाम उतरती,
सूरज धीरे ढलता है,
जल में जैसे लाल दिया कोई
चुपके-चुपके जलता है।
हाथ उठे तो लगता जैसे
आकाश झुक आया,
डूब रहे उस सूर्य ने भी
जीवन-पाठ पढ़ाया।
जब छठ उतरता है बिहार में,
अस्त भी त्योहार बनता है,
डूब रहा जो आज क्षितिज पर,
कल फिर सूर्य बनता है।
ईख खड़ी है खेतों जैसी,
ठेकुआ घर की गंध,
लोकगीत में माँ की आवाज़ें,
आँखों में संबंध।
मगही, मैथिली, भोजपुरी,
अंगिका की तान,
एक घाट पर मिलकर गाता
पूरा हिन्दुस्तान।
जब छठ उतरता है बिहार में,
भाषा बाँह पकड़ती है,
बोली चाहे जैसी हो—
धड़कन एक ही धड़कती है।
शहरों में जो खोया था वह
गाँव उसे बुलाता है,
माँ का सूना आँगन फिर से
बेटे को अपनाता है।
रेल नहीं बस रेल रह जाती,
रिश्तों की वह डोर,
छठ बहाने लौट पड़ता है
बचपन अपनी ओर।
जब छठ उतरता है बिहार में,
परदेस छोटा पड़ जाता है,
माँ के एक पुकारते ही
सारा शहर छूट जाता है।
भोर हुई, पूरब मुस्काया,
जल में सोना घोला,
सूरज ने जब आँखें खोलीं,
घाट ने मन खोला।
हाथों में अर्घ्य, आँखों में
सदियों का विश्वास,
उस क्षण जैसे मिट्टी ने ही
छू लिया आकाश।
जब छठ उतरता है बिहार में,
माटी नभ हो जाती है,
एक किरण के साथ अचानक
आत्मा रवि हो जाती है।
यदि पूछे कोई—
“छठ कहाँ रहता है?”
कहना—
जहाँ माँ की आँखों में
परिवार के लिए प्रार्थना है,
जहाँ किसान की हथेली में
अगले मौसम की आशा है,
जहाँ परदेस गया बेटा
मिट्टी को फिर पहचानता है,
जहाँ डूबते सूर्य को भी
सम्मान मिलता है—
वहीं छठ है,
वहीं बिहार है!
वहीं छठ है—
और वही मेरा बिहार है!!
-शीतल राज 'किशोर'
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