बाँस की पतली नसों में गाँव का इतिहास है,
सूप नहीं, यह पीढ़ियों का चलता विश्वास है।
जिस हाथ ने इसे थामा, वह अकेला कहाँ रहा—
उसकी हथेली में पूरा अपना बिहार पास है।
दउरे में फल नहीं, माँ की यादें रखी हैं,
ईख की हर गाँठ में बरसों की फरियादें रखी हैं।
परदेस से लौटे बेटे ने जब चौखट छुई—
लगा जैसे घर ने फिर अपनी साँसें रखी हैं।
नदी ने आज सूरज का चेहरा सँवार दिया,
लहरों ने जैसे आकाश को अपना हार दिया।
मैं घाट पर खड़ा था, मगर समझ तभी आया—
पानी ने आज मुझको मेरा बिहार दिया।
डूबते सूरज को अर्घ्य मिला, यह कैसी रीत है,
हार में भी सम्मान बचा लेना जीवन की जीत है।
छठ ने कहा—ढलने से पहले घबराना मत,
हर शाम की पलकों में छिपी हुई भोर की प्रीत है।
शहरों की भीड़ में वर्षों से जो घर भूल गया,
छठ आया तो माँ के आँचल में फिर से खुल गया।
रेल ने केवल आदमी को गाँव तक पहुँचाया—
असल में तो वह भीतर से बिहार तक पहुँच गया।
ठेकुए की मिठास में गुड़ भर ही नहीं होता,
उसमें माँ के हाथों का श्रम कमतर नहीं होता।
जिसे तुम प्रसाद कहकर बस खा लेते हो—
उसमें पूरे घर का स्नेह कमतर नहीं होता।
मुक्तक ७ — लोकभाषा
मैथिली की मिठास मिली, मगही का मान मिला,
भोजपुरी की तान मिली, अंगिका का गान मिला।
बोली कितनी भी हों, धड़कन एक ही निकली—
छठ के घाट पर पूरा बिहार एक जान मिला।
जिसे दुनिया ने कहा व्रत, वह माँ का संकल्प था,
उसके मौन के भीतर पूरा घर विकल्प था।
वह जल में खड़ी रही तो समझ आया मुझको—
परिवार की नींव में अक्सर किसी माँ का तप था।
भोर की पहली किरण ने जब नदी को छुआ,
जल ने जैसे रात का अंतिम आँसू धो दिया।
लोग सूर्य को अर्घ्य देने खड़े थे घाट पर—
और सूरज ने हर चेहरे को भीतर से रोशन कर दिया।
न मिट्टी केवल मिट्टी है, न नदियाँ केवल धार हैं,
यहाँ पर्वों में भी सदियों के संस्कार हैं।
छठ को समझना हो तो बिहार पढ़ लेना—
यहाँ त्योहार नहीं मनते, त्योहारों में परिवार हैं।
-शीतल राज 'किशोर'
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