आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

स्त्री की व्यथा

                
                                                         
                            जब तुम नही रहोगी....
                                                                 
                            
तुम्हारे नही होने का शोक मनाएंगे लोग

जब तुम हो...
तो ऐसी क्यों हो...वैसी क्यों नही
हो तो ऐसी भी सकती थी !!
कहकर तुम्हारा जीना दुश्वार करेंगे....

कितनी ही बार तुम शून्य में लकीर खींचोगी सीधी
पर तुम्हें हमेशा तिरछा ही दिखाई देगा
तुम दूसरों के टोकने से बेहिसाब डरी हुई हो
और यही तो जीत है उनकी...
कि छीन लें तुम्हारा सपना, तुम्हारे गुण, तुम्हारी चेतना
तुम्हे कर दें तुमसे ही जुदा

कि तुम कुछ भी करो या न करो
तुम बस गलत हो...
तुम बस गलत थी...
लोग तुम्हारा कांफिडेंस छीन लेंगे
इसकी शुरुआत अपनो से होगी

फिर तुम बाहर जाओगी...
मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठोगी...
खाली आसमान को तकोगी...
कुछ बकोगी तो पागल...
चुप रहोगी तो मन्द करार दी जाओगी...
तुम इस रहस्यमय दुनिया में देह से परे कभी कुछ नही हो पाओगी !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर