जब तुम नही रहोगी....
तुम्हारे नही होने का शोक मनाएंगे लोग
जब तुम हो...
तो ऐसी क्यों हो...वैसी क्यों नही
हो तो ऐसी भी सकती थी !!
कहकर तुम्हारा जीना दुश्वार करेंगे....
कितनी ही बार तुम शून्य में लकीर खींचोगी सीधी
पर तुम्हें हमेशा तिरछा ही दिखाई देगा
तुम दूसरों के टोकने से बेहिसाब डरी हुई हो
और यही तो जीत है उनकी...
कि छीन लें तुम्हारा सपना, तुम्हारे गुण, तुम्हारी चेतना
तुम्हे कर दें तुमसे ही जुदा
कि तुम कुछ भी करो या न करो
तुम बस गलत हो...
तुम बस गलत थी...
लोग तुम्हारा कांफिडेंस छीन लेंगे
इसकी शुरुआत अपनो से होगी
फिर तुम बाहर जाओगी...
मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठोगी...
खाली आसमान को तकोगी...
कुछ बकोगी तो पागल...
चुप रहोगी तो मन्द करार दी जाओगी...
तुम इस रहस्यमय दुनिया में देह से परे कभी कुछ नही हो पाओगी !!
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