सुनों
आखिर क्या दोष था मेरा
क्यूँ....
क्यूँ लगाया मुझपर
ये आरोप
चरित्रहीन...
यही कहा था न
और..
और कितनी सहजता से
आभास भी है...तुम्हें
उस पल की मेरी पीड़ा
मेरी दशा का
यूँ लगा..
जैसे सैकडो़ विषैले सर्पों ने
एक साथ डँसा हो
मेरी प्रतिष्ठा की आत्मा पर
आघात किया ...तुमने
मेरी लज्जा को
निर्वस्त्र किया
मेरे स्वाभिमान के टुकड़े कर दिए तुमने
क्यूँ ???
सिर्फ इसलिए की तुम पुरुष हो
अधिकार है तुम्हे
मेरे जीवन रूपी सत्ता के
निरंकुश शासक हो तुम
कभी ...
कभी एक बार
अपने पुरुष होने के अहंकार को
त्यागकर पास बैठे होते मेरे
मेरी हथेलियों को स्नेह से
स्पर्श किया होता
मुझे संपत्ति न समझ
साथी समझा होता
कभी देखा तो होता मेरे ...
मेरे व्याकुल नेत्रों की और
कि उनमे सदैव
रक्त सी लाली ...क्यूँ रहती है
कि पलकों के कोर
नम से
क्यूँ रहते हैं
कि मेरी आवाज़ में
एक सिसक सी
क्यूँ रहती है
कि..मेरे हृदय में
एक घुटन सी क्यूँ
रहती है
मौन अधरों से भी हर क्षण
चीखती है मेरी आत्मा
पर ....
पर अहंकार की चादर में लिपटा
तुम्हारा ह्रदय
वज्र हो चुका है
क्षमता ही नहीं
कि तुम...
तुम मेरी पीडा़ का अनुभव कर सको
संवेदनहीन हो चुके हो तुम
तुम्हारे लिए तो मैं
एक वस्तु हूँ
सिर्फ भोग की एक वस्तु
सच .....
क्या सिर्फ
एक वस्तु हूँ मैं
इसके अतिरिक्त
और ....
और कुछ भी नहीं .....???
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