हादिसे ऐसे भी पेश आने लगे हैं
बाग़बां से फूल घबराने लगे हैं
वक़्त इस से भी बुरा होगा कोई क्या
मुझ पे दुश्मन भी तरस खाने लगे हैं
देखकर उरियाँ शराफत को सरापा
बेहया भी अब तो शर्माने लगे हैं
क्यूँ गुनाहे ज़हन की हम को सज़ा हो
दस्तो पा अब शोर बरपाने लगे हैं
या ख़ुदा ये क्या चमन में हो रहा है
फूल खिलने की सज़ा पाने लगे हैं
दुश्मनों! तुम तो निभाओ फ़र्ज़ अपना
दोस्त मेरे मुझसे कतराने लगे हैं
चुन लिया मैंने जब अपना नेक रस्ता
लोग मुझको राह दिखलाने लगे हैं
जाल में यूँ ही नहीं आया परिंदा
कुछ न कुछ सय्याद के दाने लगे हैं
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