मैं पूछता हूँ खुद से क्या दौर चल रहा है,
रेत के समुन्दर में मगरमच्छ पल रहा है।
दिखावे के उजाले हैं हर शख्स के चेहरे पर,
मगर भीतर अँधेरा और जहर ढल रहा है।
सच्चाई की जमीं पर अब पाँव टिकते नहीं,
झूठ के आसमां में हर ख्वाब पल रहा है।
जो कल तक थे मसीहा, रहजन बने बैठे,
इंसानियत का दम घुटनों पे निकल रहा है।
अदालतें सजी हैं पर इंसाफ लापता है,
कागज़ की कश्तियों पर तूफ़ान मचल रहा है।
मासूमियत को अपनी गिरवी रख आए जो,
आज वही ज़माने में सबसे सफल रहा है।
-शैलेंद्र शुक्ला"हलदौना "
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